Principle Of Life

* You would achieve more, if you don't mind who gets the credit.
* When everything else is lost, the future stillremains.
* Don't fight too much. Or the enemy would know your art of war .
* The only job you start at the top is when you dig a grave.
* If you don't stand for something, you'll fall for everything.
* If you do little things well, you'll do big ones better.
* Only thing that comes to you without effort is old age.
* You won't get a second chance to make the first impression .
* Only those who do nothing do not make mistakes.
* Never take a problem to your boss unless you have a solution.
* If you are not failing you're not taking enough risks.
* Don't try to get rid of bad temper by losing it.
* If at first you don't succeed, skydiving is not for you.
* Those who don't make mistakes usually don't make anything
* There are two kinds of failures. Those who think and never do,
and those who do and never think.
* Pick battles big enough to matter, small enough to win.
* All progress has resulted from unpopular decisions.
* Change your thoughts and you change your world.
* Understanding proves intelligence, not the speed of the learning.
* There are two kinds of fools in this world. Those who give advise and those who don't take it.
* The best way to kill an idea is to take it to a meeting.
* Management is doing things right. Leadership is doing the right things.
* Friendship founded on business is always better than business founded on friendship .

Earn Money Online

EARN MONEY FOR READING THE MAILS REGISTER ITS FREE
cashmails.org

bankomails.com

goldbizs.com
-------------------------------------------------------------------------------------
EARN MONEY BY PAID TO SIGNUP AND PAID TO CLICK
------------------------------------------------------------------------------------





Paid up for completing surveys

श्री दुर्गा मन्त्र

श्री दुर्गा मन्त्र
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्ज्वल प्रज्ज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट्‍ स्वाहा ॥
नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनी ।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनी ॥1॥

नमस्ते शुम्भहन्त्रयै च निशुम्भासुरघातिनी ।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे ॥2॥

ऐंकारी सृष्टिरुपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका ।
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ॥3॥

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ।
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणी ॥4॥

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी ।
क्रां क्रीं क्रं कालिकादेवि शां शीं शुभं कुरु ॥5॥

DURGA CHALISA

श्री दुर्गा चालीसा

ॐ सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
श्री दुर्गा चालीसा
नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।
नमो नमो अम्बे दुःख हरनी ॥
निरंकार है ज्योति तुम्हारी ।
तिहूँ लोक फैली उजियारी ॥
शशि ललाट मुख महाविशाला ।
नेत्र लाल भृकुटी बिकराला ॥
रूप मातु को अधिक सुहावे ।
दरश करत जन अति सुख पावे ॥
तुम संसार शक्ति लय कीना ।
पालन हेतु अन्न धन दीना ॥
अन्नपूर्णा तुम जग पाला ।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥
प्रलयकाल सब नाशनहारी ।
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी ॥
शिव योगी तुम्हरे गुन गावें ।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥
रूप सरस्वती का तुम धारा ।
दे सुबुधि ऋषि-मुनिन उबारा ॥
धर्‍यो रूप नरसिंह को अम्बा ।
परगट भईं फाड़ कर खम्बा ॥
रक्षा करि प्रहलाद बचायो ।
हिरनाकुश को स्वर्ग पठायो ॥
लक्ष्मी रूप धरो जग जानी ।
श्री नारायण अंग समानी ॥
क्षीरसिन्धु में करत बिलासा ।
दयासिन्धु दीजै मन आसा ॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी ।
महिमा अमित न जात बखानी ॥
मातंगी धूमावति माता ।
भुवनेश्वरि बगला सुखदाता ॥
श्री भैरव तारा जग-तारिणि ।
छिन्न-भाल भव-दुःख निवारिणि ॥
केहरि वाहन सोह भवानी ।
लांगुर वीर चलत अगवानी ॥
कर में खप्पर-खड्‍ग बिराजै ।
जाको देख काल डर भाजै ॥
सोहै अस्त्र विविध त्रिशूला ।
जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥
नगरकोट में तुम्हीं बिराजत ।
तिहूँ लोक में डंका बाजत ॥
शुम्भ निशुम्भ दैत्य तुम मारे ।
रक्तबीज-संखन संहारे ॥
महिषासुर दानव अभिमानी ।
जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥
रूप कराल कालिका धारा ।
सेन सहित तुम तेहि संहारा ॥
परी गाढ़ सन्तन पर जब-जब ।
भई सहाय मातु तुम तब तब ॥
अमर पुरी अरू बासव लोका ।
तव महिमा सब रहें अशोका ॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी ।
तुम्हें सदा पूजें नर-नारी ॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावै ।
दुख-दारिद्र निकट नहिं आवै ॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई ।
जन्म-मरण ता कौ छुटि जाई ॥
योगी सुर-मुनि कहत पुकारी ।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ॥
शंकर आचारज तप कीनो ।
काम-क्रोध जीति तिन लीनो ॥
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को ।
अति श्रद्धा नहिं सुमिरो तुमको ॥
शक्ति रूप को मरम न पायो ।
शक्ति गई तब मन पछितायो ॥
शरणागत ह्‍वै कीर्ति बखानी ।
जय जय जय जगदम्ब भवानी ॥
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा ।
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा ॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो ।
तुम बिन कौन हरे दुख मेरो ॥
आशा तृष्णा निपट सतावैं ।
मोह-मदादिक सब बिनसावैं ॥
शत्रु नाश कीजै महरानी ।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥
करहु कृपा हे मातु दयाला ।
ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला ॥
जब लग जिओं दया फल पावौं ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनावौं ॥
दुर्गा चालीसा जो कोई गावै ।
सब सुख भोग परमपद पावै ॥
देवीदास शरण निज जानी ।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी ॥
॥इति श्रीदुर्गा चालीसा समाप्त ॥